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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने POCSO अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मिली अग्रिम जमानत को बरकरार रखते हुए राहत दी है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत इस स्तर पर हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने के पक्ष में नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा प्रदान की गई अग्रिम जमानत पर रोक लगाने या उसे रद्द करने की मांग अस्वीकार कर दी गई।

इस फैसले के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और सह-आरोपी को मिली अग्रिम जमानत फिलहाल प्रभावी बनी रहेगी।

हाईकोर्ट ने मार्च में दी थी अग्रिम जमानत

इससे पहले 25 मार्च 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी को अग्रिम जमानत प्रदान की थी।

हाईकोर्ट ने जमानत देते समय कुछ शर्तें भी लगाई थीं, जिनमें:

  • जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करना
  • मामले से संबंधित सार्वजनिक बयानबाजी से बचना
  • मीडिया में विवादित टिप्पणियां न करना

जैसे निर्देश शामिल थे।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा हुआ है। शिकायत के आधार पर POCSO अदालत के निर्देश पर मामला दर्ज किया गया था।

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि कुछ नाबालिग शिष्यों (बटुकों) के साथ कथित यौन शोषण की घटनाएं हुईं। शिकायत के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य के खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।

जांच जारी रहेगी

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केवल अग्रिम जमानत से संबंधित है और इसका मामले की अंतिम सुनवाई या आरोपों की सत्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार जारी रहेगी। जांच एजेंसियां आरोपों से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों की पड़ताल करती रहेंगी।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल आरोपियों को मिली अग्रिम जमानत बरकरार रहेगी, जबकि मामले की जांच और ट्रायल की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

अब सभी पक्षों की निगाहें जांच की प्रगति और निचली अदालत में होने वाली आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं।

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