soil testing in the fields

चंडीगढ़, 9 जून। हरियाणा सरकार खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। किसानों की जमीन की वास्तविक सेहत जानने और मिट्टी की उर्वरता को बेहतर बनाने के लिए राज्यभर में आधुनिक ऑर्गेनिक कार्बन एनालिसिस किट उपलब्ध कराई जाएंगी। सरकार का मानना है कि भविष्य की सफल खेती केवल उन्नत बीज और खाद पर नहीं, बल्कि मिट्टी में मौजूद जैविक कार्बन की मात्रा पर निर्भर करेगी।

इस योजना के तहत प्रदेश में 332 अत्याधुनिक ऑर्गेनिक कार्बन परीक्षण किट खरीदी जाएंगी, जिन पर लगभग 2.5 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। यह फैसला कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा की अध्यक्षता में आयोजित हाई पावर्ड परचेज कमेटी की बैठक में लिया गया। बैठक में शिक्षा मंत्री महीपाल सिंह ढांडा, कृषि विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव विजयेंद्र कुमार सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

सरकार के अनुसार इन किटों की सहायता से प्रदेश की 106 सरकारी प्रयोगशालाओं में किसानों के खेतों से लिए गए मिट्टी के नमूनों की जांच की जाएगी। इससे किसानों को अपनी जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन के स्तर की सटीक जानकारी मिल सकेगी और वे मिट्टी की जरूरत के अनुसार खेती की रणनीति तैयार कर पाएंगे।

कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल मिट्टी परीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती की लागत घटाकर किसानों की आय बढ़ाना भी है। ऑर्गेनिक कार्बन के सही स्तर की जानकारी मिलने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, जिससे किसानों का खर्च घटेगा और खेती अधिक टिकाऊ बन सकेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर 0.5 से 0.75 प्रतिशत के बीच होना चाहिए, जबकि 1 प्रतिशत या उससे अधिक को आदर्श माना जाता है। यदि यह स्तर 0.5 प्रतिशत से नीचे चला जाए तो मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित होने लगती है और फसल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे आवश्यक पोषक तत्वों को संरक्षित रखकर पौधों तक पहुंचाने में मदद करता है। साथ ही इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है, फसलों की जड़ें मजबूत होती हैं और रासायनिक खादों की आवश्यकता भी कम हो जाती है।

सरकार की इस पहल को हरियाणा में वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में किसानों की उत्पादकता और आय दोनों में सुधार होने की उम्मीद है।

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