इंदौर: देश में अवैध घुसपैठ और उससे जुड़े जनसांख्यिकीय बदलावों के मुद्दे पर गठित उच्च स्तरीय समिति ने संकेत दिए हैं कि आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार को और सख्त कानूनी उपायों की सिफारिश की जा सकती है। समिति के अध्यक्ष और पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर ने कहा कि यह विषय केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके प्रभाव देश के कई हिस्सों में महसूस किए जा रहे हैं।
जनसांख्यिकीय बदलाव को बताया बड़ी चुनौती
एक साक्षात्कार में जस्टिस नावलेकर ने कहा कि अवैध घुसपैठ से उत्पन्न जनसांख्यिकीय परिवर्तन नीति-निर्माताओं और प्रशासन के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं।
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल सुरक्षा से जुड़ा नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव भी छोड़ता है। इसलिए इसके विभिन्न पहलुओं का गहराई से अध्ययन किया जा रहा है।
संसाधनों पर बढ़ता है दबाव
जस्टिस नावलेकर के अनुसार सरकार विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जरूरतमंद लोगों तक लाभ पहुंचाने का प्रयास करती है, लेकिन यदि लाभार्थियों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ती है तो संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में वास्तविक पात्र लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
कानून के साथ सख्त क्रियान्वयन भी जरूरी
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी समस्या के समाधान के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि यदि समिति को अध्ययन के दौरान यह महसूस होता है कि मौजूदा कानूनी ढांचा पर्याप्त नहीं है, तो वह केंद्र सरकार को नए या अधिक प्रभावी कानूनी प्रावधानों की सिफारिश कर सकती है।
व्यापक अध्ययन कर रही है समिति
गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का अध्ययन कर रही है। समिति का उद्देश्य यह समझना है कि इन बदलावों के पीछे कौन-कौन से कारक जिम्मेदार हैं और भविष्य में उनसे निपटने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं।
अध्ययन के दौरान सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जा रहा है।
शरणार्थी और अवैध घुसपैठ में अंतर
जस्टिस नावलेकर ने कहा कि भारतीय कानून शरणार्थियों और अवैध रूप से प्रवेश करने वाले व्यक्तियों के बीच स्पष्ट अंतर करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आव्रजन और सीमा सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश भी इसी तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।
एक वर्ष में सौंपेगी रिपोर्ट
उच्च स्तरीय समिति में प्रशासन, सुरक्षा और नीति क्षेत्र से जुड़े कई अनुभवी सदस्य शामिल हैं। समिति को अपनी रिपोर्ट एक वर्ष के भीतर सरकार को सौंपनी है।
जरूरत पड़ने पर समिति के कार्यकाल को अतिरिक्त छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है। रिपोर्ट में अध्ययन के निष्कर्षों के साथ नीतिगत और कानूनी सुझाव भी शामिल किए जाने की संभावना है।
नीति निर्माण में अहम हो सकती है रिपोर्ट
विशेषज्ञों का मानना है कि समिति की रिपोर्ट भविष्य में सीमा प्रबंधन, पहचान सत्यापन, नागरिकता संबंधी प्रक्रियाओं और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े नीतिगत फैसलों के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
अब सभी की नजरें समिति की अंतिम रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों पर टिकी हुई हैं, जो आने वाले समय में इस विषय पर सरकार की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
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